आखिर दानवीर कर्ण महाभारत युद्ध के बाद कहां गायब हो गए

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आखिर दानवीर कर्ण महाभारत युद्ध के बाद कहां गायब हो गए

कर्ण को मरणोपरांत कहां अंतिम संस्कार किया गया

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दानवीर कर्ण का नाम तो आप सभी जानते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं आखिर दानवीर कर्ण महाभारत युद्ध के बाद कहां गायब हुई आखिर उनको मरणोपरांत कहां अंतिम संस्कार किया गया तो आज हम बताते हैं गुजरात के सूरत शहर में बहुत ही पवित्र और दुर्गा स्थान है

रुद्राक्ष की उत्पत्ति भोलेनाथ के आंसूओं से हुई

सूरत शहर में बहुत ही पवित्र और दुर्गा स्थान है

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जहा पर दानवीर कर्ण सैया में लेटे हुए उनके साथ में पांच पांडव एवं भगवान श्री कृष्ण रुक्मणी के साथ उस जगह पर विराजमान हैं तीन पत्ती के नाम से चार धाम भी कहा जाता है सूरत में यह जगह बहुत ही मशहूर है और इसके बहुत से प्रमाण हैं जिससे हम महाभारत काल से जोड़कर देखते हैं

तब राजा कर्ण ने अपने सोने के आभूषण को तोड़ कर दिए

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आइए हम आपको इसकी पूरी कहानी की ओर ले चलते हैं। जब कुरुक्षेत्र में युद्ध में युद्ध में दानवीर कर्ण राजा घायल होकर गिरी तब श्री कृष्ण भगवान ने राजा कर्ण की दानवीरता की परीक्षा लेने के लिए साधु रूप धारण कर करके उनसे कुछ दान देने के लिए कहा तब राजा कर्ण ने अपने सोने के आभूषण को तोड़ कर दिए

श्री कृष्ण भगवान और पांडवों सब तीर्थ यात्रा करते हुए

इससे श्री कृष्ण भगवान ने खुश होकर उन वरदान मांगने के लिए कहा राजा करने वर मांगते हुए कहा कि हे भगवान मैं कुंवारी माता का पुत्र हूं इसलिए मुझे कुंवारी भूमि पर ही अग्नि दहा दीजिएगा। तत्पश्चात श्री कृष्ण भगवान और पांडवों सब तीर्थ यात्रा करते हुए यहां अगर उन्हें अग्नि दहा दिए

मेरे रिश्तेदार नहीं परंतु साक्षात परमात्मा है

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इससे पर पांडवों पर जब क्वारी भूमि पर संघ का जताया तो श्री कृष्ण भगवान ने राधा कार्ड को प्रकट करके तापी मेरी बहन है मुझे कुंवारी भूमि पर ही अपनी देह दिया गया है और आप जिस पर शंका कर रहे हैं वह आपके और मेरे रिश्तेदार नहीं परंतु साक्षात परमात्मा है तब पांडवों ने श्री कृष्ण भगवान से कहा कि

उसकी इच्छा पूर्ण दानवीर राजा कर्ण के प्रताप से पूरी होगी

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हमें तो पता चल गया परंतु आने वाले युवकों कैसे पता चलेगा तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि यहां पर तीन पत्ते का बट होगा तो ब्रह्मा विष्णु और महेश के प्रतीक रूप होंगे और जो कोई मानवीय इसका मन और मन मानता रखेगा उसकी इच्छा पूर्ण दानवीर राजा कर्ण के प्रताप से पूरी होगी।
कथा स्त्रोत – तापी पुराण

सूरत से वंदना ठाकुर की रिपोर्ट

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