
राजनीतिक कारणों से इस्लाम को तलवार के बल पर फैलाया

ईरान-इस्राइल के पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध की आग में झुलसने से बचा, यह कोई पहला संघर्ष नहीं था, न हीं यह आखिरी। हालिया घटनाक्रम इतिहास का वह दर्पण है, जिसमें मनुष्य की अंतहीन शांति-कामना और उसकी विडंबना यह है कि एक और मानव जाति विश्व शांति के स्वप्न देखती है. रक्तरंजित प्रवृत्तियों का विरोधाभास साफ़ दिखता है। वहीं दूसरी ओर उसका इतिहास खून-खराबे और नरसंहारों से अटा पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक, सन 1800 से अब तक लगभग चार करोड़ लोग सशस्त्र संघषों में मारे जा चुके हैं, जबकि समस्त इतिहास में हिंसा और युद्धों के चलते मृत्यु की आंकड़ा इससे कहीं अधिक गुना में पहुंच जाता है। ये आंकड़े चीत्कार कर कहते हैं-मानवता को सबसे बड़ा खतरा किसी प्राकृतिक आपदा या महामारी से नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य और उसकी विकृत मानसिकता से है इस वैश्विक संकट की जड़ तीन स्थायी विकृतियों में निहित है-पहला, असीमित व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं: दूसरा, साम्राज्यवादी सोच; और तीसरा, मजहबी असहिष्णुता। ये तीनों या फिर इन तीनों का घातक मेल ही मानव सभ्यता को बार-बार विनाश की और धकेलता है। इतिहासकार और इस्लामी विशेषज्ञ प्रो. इश्तियाक अहमद जिल्ली द्वारा अनुवादित तारीख-ए-फिरोजशाही के अनुसार, खलीफा उर्मर ने अरब, सीरिया, मिस्त्र, खुरासान और रोम तक इस्लाम को तलवार के बल पर फैलाया। मूर्तिपूजा और अग्निपूजा का समूल नाश किया गया। भारत में भी मोहम्मद बिन कासिम, गजनवी, गोरी, वावर और टीपू सुल्तान जैसे इस्लामी आक्रांताओं के आक्रमणों का एक रक्तरंजित इतिहास है, जिसकी गवाही खुद उनके दरवारी और समकालीन इतिहासकार देते हैं।
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संज्ञान लिया है।कब दूर होगी यह बीमारी

ईस्मइयत ने भी अपने इतिहास में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। 1095 से 1291 तक चले क्रूसेड्स में ईसाई सेनाओं ने यरुशलम के नाम पर लाखों लोगों…ईरान-इस्राइल के बीसवीं सदी आते-आते यह सोचा गया कि शायद सभ्यता अब युद्धों से ऊपर उठ चुकी है। परंतु इतिहास ने एक बार फिर गलते साबित किया।ईरान-इस्राइल के विश्वयुद्ध (1914-18) मानवता के लिए घातक सिद्ध हुआ। इसके बाद वैश्विक शांति के लिए ‘लीग ऑफ नेशंस’ बनाई गई, पर वह ध्वस्त हो गई।ईरान-इस्राइल के 1939 से 1945 तक दूसरा विश्वयुद्ध और भी अधिक भयानक रूप में आया। तब जाकर 1945 में ‘संयुक्त राष्ट्र’ की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य वैश्विक युद्ध रोकना था। लेकिन क्या वास्तव में वह उद्देश्य पूरा हुआ।



