
शिव भक्त चोल राजाओं को नजरअंदाज करती आई थी डीएमके

मोदी के दो वर्ष पूर्व संसद में चोल साम्राज्य के धर्मदंड सेंगोल की स्थापना के जरिये मोदी सरकार ने दक्षिण और उत्तर भारत के बीच ऐतिहासिक कड़ी को जोड़ने का काम शुरू किया था। रविवार को चोल सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम द्वारा स्थापित राजधानी गंगईकॉड चोलपुरम के 1000 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक सिक्का जारी कर इसे और आगे बढ़ाया। इसने तमिलनाडु की समृद्ध ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत को राजनीति के केंद्र में ला दिया है। इसे चोल साम्राज्य की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत के सहारे तमिलनाडु की राजनीति को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। साथ ही तमिलनाडु को सनातन से जोड़ने की कोशिश के रूप में भी। इसने सनातन के खिलाफ चलने वाली द्रविड़ राजनीति को बैकफुट पर ला दिया है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन अब तक उपेक्षित गंगईकोंड चोलपुरम के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों के जीर्णोद्धार के लिए खजाना खोलने पर मजबूर हो गए हैं।>>>Visit: Samadhanvani
लद्दाख में एलएसी के सामने बसेंगे तिब्बती चीन को मिर्ची

गंगईकोंड चोलपुरम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। गंगईकोंड चोलपुरम की नींव राजेंद्र चोल-प्रथम की गंगा के मैदान तक की विजय के बाद रखी गई थी। वहां बड़ा तालाब बनाकर गंगा से लाया गया जल डाला गया था। गंगईकोंड चोलपुरम का अर्थ है “गंगा को लाने वाले चोल राजा”। जाहिर है कि यह उत्तर भारत और तमिलनाडु के साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को इसी गंगईकोंड चोलपुरम का अर्थ है “गंगा को लाने वाले चोल राजा”। जाहिर है कि यह उत्तर भारत और तमिलनाडु के साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को इसी स्थल से तमिलनाडु की जनता को स्पष्ट संदेश दिया है। इनमें 19.20 करोड़ उस तालाब के जीर्णोद्धार के लिए दिए गए, जिसमें गंगा जल मिलाया गया था। तालाब से जुड़ी 38 किलोमीटर लंबी नहर के लिए 12 करोड़ और पूरे परिसर के पर्यटन स्थल के विकास के लिए 7.20 करोड़ की घोषणा की गई।
बैकफुट पर आई स्टालिन सरकार ने सांस्कृतिक धरोहर के जीर्णोद्धार के लिए खोला तमिलनाडु में रविवार को गंगईकोंडा चोलापुरम मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बौद्ध गुरु दलाई लामा के लद्दाख प्रवास के बीच तिब्बतियों को ऐसी जगह बसाने की रणनीति बनी है जिससे चीन को जरूर मिर्ची लगेगी। लेह जिले में चीन से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के करीब चुमुर क्षेत्र में तिब्बत से पलायन कर चुके लोगों के लिए बसाने की तैयारी है। चीन के सामने तिब्बतियों को बसाने के पीछे क्षेत्र की सुरक्षा को भी बल मिलेगा। क्योंकि चीन चुमुर में कई बार घुसपैठ की कोशिश भी कर चुका है। लेह में बसे तिब्बतियों के पुनर्वास को लेह के थिक्से मठ के थिक्से रिनपौचे ने सेंट्रल तिब्ब्तन एडमिनिस्ट्रेशन को 7.75 एकड़ भूमि दी है।
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