
पश्चिमी देशों ने रूस से बंद की खरीद तो मौके का फायदा उठाकर भारत बना प्रमुख खरीदार

यूक्रेन जंग के रूसी तेल खरीद पर आपत्ति जताते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बतौर जुर्माना अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की तो यह एकदम बिजली गिरने, जैसा ही लगा। हालांकि, भारत दबाव की रणनीति के आगे झुकता नहीं दिख रहा। वैसे भी रूस उसका पुराना रणनीतिक सहयोगी ‘रहा है। यही वजह है कि तीन साल पहले यूक्रेन पर हमले के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस को सबक सिखाने के लिए उससे तेल खरीदना लगभग पूरी तरह बंद कर दिया, तो भारत ने न केवल खरीद जारी रखी, बल्कि प्रमुख खरीदार बन गया।रूस को वित्तीय नुकसान पहुंचाने और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को दंडित करने के अमेरिका और यूरोप के प्रयासों ने तेल की. कीमतों को काफी नीचे ला दिया। भारत ने इसे अच्छा मौका समझा और इसे लपक लिया। भारत और रूस का लंबा व्यापारिक इतिहास रहा है, और ऊर्जा व्यापार इस रिश्ते में आसानी से फिट बैठता है। यह चीन के अलावा किसी भी अन्य देश से अधिक था। भारतं पिछले दो वर्षों से लगातार रूसी तेल खरीद रहा है। कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद हर वर्ष बिक्री लगभग 275 अरब डॉलर की रही। यहां तक, पारंपरिक रूप से भारत के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता रहे इराक और सऊदी अरबं भी दरकिनार हो गए हैं। रूस भारत को उरल्स ग्रेड और ईएसपीओ ग्रेड कच्चा तेल छूट पर बेचता है, जिसकी कीमत ब्रेंट क्रूड से 15 से 20% तक कम रहती है।
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यूक्रेन जंग के बाद तेल का यह सौदा दोनों देशों के लिए फायदेमंद रहा है। रूस को कच्चा तेल यूरोपीय संघ की ओर से निर्धारित सीमा के तहत 60 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर बेचने का मौका मिला। भारत ने छूट पर खरीदा। उसकी तेल कंपनियों ने कुछ तेल घरेलू खपत के लिए रिफाइन किया। बाकी को डीजल व अन्य उत्पादों के रूप में निर्यात किया। कुछ हिस्सा यूरोप को भी निर्यात किया गया। विदेशी आयात पर कम भुगतान अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा रहा, जिससे भारत की मुद्रा सुरक्षा बढ़ी। ट्रंप भारत की व्यापार व्यवस्था को लेकर कई तरह की शिकायतें करते रहे हैं, यूक्रेन जंग के बाद लेकिन रूसी खरीद पर कभी ज्यादा जोर नहीं दिया था। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे में भारत को लग रहा था कि ट्रंप के दोबारा चुने जाने के बाद उसे राहत रहेगी। रूस से दूरी का बाइडन व अन्य नेताओं का दबाव कम हो जाएगा।



