
CRIS के असली टेक्नोक्रेट—इंजीनियर और आईटी प्रोफेशनल

क्रिस देश में जहाँ प्रधानमंत्री और पूरी दुनिया डिजिटल क्रांति की बात कर रही है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की दौड़ में भारत को आगे बढ़ाने की रणनीति बना रही है, वहीं रेलवे मंत्रालय का आईटी विंग CRIS (Centre for Railway Information Systems)—जिसने पीआरएस, एफओआईएस और सुपरऐप जैसे बड़े डिजिटल सुधार दिए—आज अपनी ही नौकरशाही के शिकंजे में जकड़ा हुआ है। इंजीनियर बने “दूसरे दर्जे” के कर्मचारीआईटी संगठन होते हुए भी क्रिस के असली टेक्नोक्रेट—इंजीनियर और आईटी प्रोफेशनल—आज हालात ऐसे हैं मानो वे दूसरे दर्जे के कर्मचारी हों। पूरा प्रबंधन डिपुटेशन पर आए रेलवे अधिकारियों के कब्जे में है। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि ये अधिकारी क्रिस को “लक्ज़री पार्किंग” की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। अपने लिए तो नियम, भत्ते और अन्य सुविधाएँ तय कर लेते हैं, मगर आईटी इंजीनियरों के मामले में इन्हीं नियमों को या तो काट-छाँट दिया जाता है या ऐसी विसंगतियाँ खड़ी कर दी जाती हैं कि कर्मचारी मजबूरी में अदालत का दरवाज़ा खटखटाते हैं। पिछले 2–3 सालों में बढ़ा खेलसबसे गंभीर आरोप कार्मिक और वित्त शाखा के मिड और टॉप लेवल डिपुटेशनिस्ट अफसरों पर हैं। कहा जा रहा है कि ये अधिकारी सुनियोजित ढंग से इंजीनियरों के वेतन-भत्ते घटाने, जानबूझकर विसंगतियाँ पैदा करने और मुकदमेबाज़ी बढ़ाने में शामिल हैं। वित्त शाखा की कार्यशैली पर तो और भी गंभीर सवाल हैं—फाइलों को 1–2 महीने तक रोके रखना, और जब आगे बढ़ाना हो तो ऐसे आपत्तियाँ लगा देना जो दफ्तर के नियमों में मौजूद ही नहीं हैं।>>>Visit: Samadhanvani
CRIS का यह हाल डिजिटल इंडिया की आत्मा के ही खिलाफ

भारी-भरकम किराया, खाली दफ्तरमामला यहीं नहीं रुकता। मार्च–अप्रैल 2025 में क्रिस ने दिल्ली प्रगति मैदान स्थित DFCC की इमारत की तीसरी और चौथी मंज़िल किराए पर ली। करीब 280–290 सीटों वाले इस दफ्तर का मासिक किराया ₹2–3 करोड़ तय हुआ। मगर जिस वक्त इमारत ली गई, उसकी हालत बदहाल थी। मरम्मत और तैयारियों में महीनों लगने थे। बावजूद इसके, पहले ही दिन से किराया देना शुरू कर दिया गया।नतीजा? 4–5 महीने तक करोड़ों का किराया देने के बाद भी सिर्फ़ 100 कर्मचारी तीसरी मंज़िल पर बैठाए जा सके, जबकि बाकी जगह अब भी तैयार नहीं। लेकिन पूरा किराया हर महीने जा रहा है! हितों का टकराव या कुछ और?यहाँ पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—इमारत DFCC की थी, जहाँ उस समय श्री विकास सिन्हा जीएम (वित्त) के पद पर थे। और जब क्रिस ने यह दफ्तर किराए पर लिया, उसी वक्त वे CRIS में डायरेक्टर (वित्त) बन गए। क्या यह महज़ संयोग है, या फिर हितों का टकराव (Conflict of Interest) का खुला मामला?डिजिटल इंडिया बनाम CRIS की हकीकतकर्मचारियों का कहना है कि क्रिस का यह हाल डिजिटल इंडिया की आत्मा के ही खिलाफ है। सवाल यह है कि जब भारत दुनिया में डिजिटल ताकत बनने की ओर बढ़ रहा है, तब क्या देश के सबसे बड़े आईटी संगठनों में से एक को डिपुटेशनिस्ट अफसरों की “मनमानी” और “लक्ज़री पोस्टिंग” का अड्डा बनने दिया जा सकता है?
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