
सिचाई विभाग में नियुक्त प्रमोद कुमार सिंह आय से अधिक संपत्ति के मालिक, विजिलेंस ने लिया संज्ञान?

प्रशासनिक पूर्वी उ0प्र0/ प्रयागराज में नियुक्त प्रशासनिक अधिकारी (लिफ्ट सिचाई खण्ड) प्रमोद कुमार सिंह द्वारा स्वः वित्तीय लाभ के वशीभूत कई विधि विरुद्ध ठेकेदार कंपनियाँ के संचालन का मामला प्रकाश में आया है, साथ ही जनहित में शिकायतकर्ता की शिकायत का विजिलेंस विभाग द्वारा संज्ञान लिया गया है तथा, सिचाई विभाग में फर्जी दस्तावेज के आधार पर पंजीकृत कंपनियों की गहन जांच एवं उन कंपनियों को भुगतान किये गये बिलो की भी गहन जाँच प्रक्रिया शुरू होने का प्रकरण सामने आया है.विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त साक्ष्यों से ज्ञात हुआ है कि, सिचाई विभाग (लिफ्ट सिचाई खण्ड) प्रयागराज उत्तर प्रदेश में विगत 17 वर्षों से नियुक्त प्रशासनिक अधिकारी प्रमोद कुमार सिंह द्वारा फर्जी दस्तांवेज के आधार पर क्रमशः झलवा निवासी राम अभिलाष चौरसिया (प्रमोद कुमार सिंह के व्यवसायिक मित्र) द्वारा धोखा धड़ी करके फर्जी कम्पनी ईश्वर इंटरप्राइजेज, मेसर्स बलवंत इंटरप्राइजेज (प्रशासनिक अधिकारी प्रमोद कुमार सिंह की बहन के दामाद) एवं मेसर्स देव इंटरप्राइजेज स्वामी देव (प्रमोद कुमार सिंह के मित्र) अवैध रूप से फर्जी दस्तावेज के आधार पर पंजीकृत प्रशासनिक अधिकारी सिचाई विभाग (लिफ्ट खण्ड) प्रयागराज प्रमोद कुमार सिंह की छत्रछाया में फलफूल रहीं है और, इन्ही कंपनियों को प्रमोद कुमार सिंह के मेहरबानी से वर्क आर्डर मिल रहा है जिससे अधिकारी के भ्र्ष्टाचार में संलिप्त होने की प्रबल सम्भावना बनती है.>>>Visit: Samadhanvani
प्रशासनिक न्याय व्यवस्था में हर अपराध के बाद बचाव का विकल्प

विश्वस्त सूत्रों की माने तो, प्रमोद कुमार सिंह के कार्यालय नियुक्त वरिष्ठ या कनिष्ठ किसी भी अधिकारी में इतनी हिम्मत नहीं है कि, प्रमोद कुमार सिंह द्वारा विभाग में पंजीकृत कंपनियों को मेरिट के आधार पर काम देने की बात करें, बस अगर सिंह ने कह दिया तो काम वरिष्ठ हो कनिष्क काम भी देना पड़ेगा और, बिल भी भुगतान करना ही पड़ेगा?सूत्रों की माने तो प्रशासनिक अधिकारी दबंग छवि के मालिक है और, दबंग व्यक्तित्व वाले अधिकारियों पर राज्य की नीति व राज्य का कानून नहीं लागू होता है, भले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री जीरो टॉलरन्स की बात करते हों किन्तु, प्रमोद कुमार सिंह जैसे राजकीय कर्मचारी राम अभिलाष चौरसिया, बलवंत एवं श्री देव जैसे कंपनियों के स्वामियों को इच्छीत वरदान देने वाली कामधेनुओ को पालना ब- खूबी जानते है. पालें भी क्यों न? हमारी शिथिल प्रशासनिक न्याय व्यवस्था में हर अपराध के बाद बचाव का विकल्प हमेशा सुलभ है, भ्र्ष्टाचार करके करोड़ों की नामी व बेनामी संपत्ति बनाओ और, जाँच में लाखों देंकर छूट जाओ. बहराल, देखने व समझने की बात है कि, विजिलेंस आरोपी कंपनियों एवं प्रशासनिक अधिकारी के विरुद्ध ईमानदारी से जाँच कर रिकवरी करती है या फिर, लाखों लेकर बचाव योजना के तहत राजकीय कर्मचारी को राहत दी जायेगी?.. शिथिल व लाचार न्याय प्रणाली के चलते कुछ भी सम्भव है?



