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कपिंग थेरेपी : गठिया सहित कई समस्याओं में राहत दे सकती है, 4 प्रमुख तरीके की कपिंग थेरेपी

कपिंग थेरेपी

कपिंग थेरेपी

भारत ही नहीं मिस्र और चीन आदि प्राचीन सभ्यताओं के पास अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियां भी रहीं हैं। जो दवाओं अलावा कई अन्य वैकल्पिक माध्यमों से शरीर की कुछ समस्याओं का उपचार कर सकती हैं। ऐसे ही एक प्राचीन तकनीक है कपिंग थेरेपी (Cupping therapy)। कुछ कपों का शरीर पर इस्तेमाल करके की जाने वाली ये थेरेपी एक बार फिर से लोकप्रिय हो रही है। आइए जानते हैं इस बारे में सब कुछ।

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पहले जानिए क्या है कपिंग थेरेपी

कपिंग थेरेपी दर्द, इन्फ्लेमेशन, ब्लड फ्लो, रिलैक्सेशन और डीप टिशु मसाज के लिए दवाइयों की जगह प्रयोग की जाने वाली एक तकनीक है। यह थेरेपी खासतौर पर पीठ, पेट, बाजू, पैर और चेहरे पर इस्तेमाल की जाती है। कप के अंदर वैक्यूम होती है, जो स्किन को ऊपर की ओर खींचती है। यह प्रक्रिया ब्लड सर्कुलेशन को रेगुलेट करती है और दर्द से राहत दिलाती है।

कपिंग थेरेपी

इसके अलावा कपिंग थेरेपी में ग्लास, बैम्बू, सिलिकॉन और मिट्टी से बने कप्स का इस्तेमाल किया जाता हैं। कपिंग थेरेपी प्राचीन समय से चली आ रही है। भले ही यह अब ट्रेंड में आई हो, परंतु पिछले लंबे समय से यह प्राचीन इजिप्ट, चाइना और मिडिल ईस्टर्न कल्चर में प्रयोग होती चली आ रही है।

जानिए किस तरह काम करती है कपिंग थेरेपी

कपिंग थेरेपी का दबाव ब्लड वेसल्स (कैपिलरीज) को स्किन के अंदर ही एक्सपेंड कर देता है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्र में ज्यादा खून पहुंचता है और समस्या जल्दी ठीक हो सकती है। क्योंकि ब्लड फ्लो एक नेचुरल हीलिंग प्रोसेस है। इसके साथ ही कई लोगों का मानना है कि कपिंग पोर्स को क्लियर करता है और बॉडी टॉक्सिन को रिलीज कर देता है।

इन समस्याओं में कारगर होती है कपिंग थेरेपी

कपिंग थेरेपी

गठिया की समस्या जिसमें अक्सर लोगों को असहनीय ज्वाइंट पेन का सामना करना पड़ता है। ऐसे में कपिंग थेरेपी आपकी मदद कर सकती है। साथ ही पीठ दर्द, गर्दन दर्द, घुटने का दर्द और कंधे के दर्द में भी यह कारगर होती है।

वहीं सांस लेने की समस्या जैसे कि अस्थमा में भी यह फायदेमंद होती है। इसके साथ ही कार्पल टनल सिंड्रोम, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिसऑर्डर, इरिटेबल बाउल डिजीज, सर दर्द और माइग्रेन के साथ ही हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्या में भी कपिंग थेरेपी की मदद ली जा सकती है।

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यहां जानें कितने प्रकार की होती है कपिंग थेरेपी

कपिंग थेरेपी की शुरुआत जानवरों की हड्डियों से की गई थी। इसके बाद बांस और चीनी मिट्टी के कप्स का इस्तेमाल होना शुरू हुआ। कपिंग थेरेपी करने के चार प्रमुख तरीके हैं।

1. ड्राई कपिंग – ड्राई कपिंग में केवल स्किन के खिंचाव की प्रतिक्रिया अपनाई जाती है।

2. वेट/ ब्लीडिंग कपिंग – इस में वैक्यूम कप्स से खिंचाव करने के साथ कंट्रोल्ड मेडिसिनल ब्लीडिंग का इस्तेमाल भी किया जाता है।

3. रनिंग कपिंग – इस प्रोसेस को अपनाने से पहले सबसे पहले पूरे शरीर में कप लगाया जाता है, फिर खिंचाव के साथ कप को स्किन के चारों और घुमाते हैं।

4. फ़्लैश कपिंग – शरीर के पर्टिकुलर हिस्से पर बार-बार कप्स को लगाते हैं और फिर निकालते है। यही प्रतिक्रिया काफी देर तक चलती है।

कपिंग थेरेपी अपनाने से पहले इसके साइड इफेक्ट भी जान लें

इस प्रोसेस के बाद कई लोगों को इसके साइड इफेक्टस से जूझना पड़ता है। यदि पहले से किसी के ऊपर प्रयोग किए गए कप को आपके ऊपर प्रयोग किया जाए, तो यह इन्फेक्शन का कारण बन सकता है। खासकर ब्लडबोर्न बीमारियां जैसे कि हेपेटाइटिस बी और सी होने की संभावना बढ़ जाती है। वही इससे कई और समस्याएं भी हो सकती हैं-

जलन महसूस होना।

नील पड़ जाना

स्किन छिल जाना

स्किन इन्फेक्शन की संभावना बनी रहना।

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