दूध पीने और इसे पचाने में लग गए 10 हजार साल ऐसा जीन खुद को हजारों साल से बदल रहा है।

लाखों इंसान ऐसे हैं जो दूध पीकर पचा नहीं पाते
दूध पीने और इसे पचाने में लग गए 10 हजार साल ऐसा जीन खुद को हजारों साल से बदल रहा

इंसान ने जानवरों का दूध पीना शुरू किया और आज तक इसे पचाने की कोशिश कर रहा है। दुनिया भर में लाखों इंसान ऐसे हैं जो दूध पीकर पचा नहीं पाते हैं। जो लोग इसे पचा लेते हैं, उनकी मदद करता है एक खास जीन। आइए जानते हैं,  पीने और उसे पचाने के दिलचस्प सफर को।

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मिल्क प्रोडक्ट्स खाते ही उन्हें दिक्कत होने लगती है। कुछ समय पहले उन्होंने खुलासा किया था कि वह लैक्टोज इनटॉलरेंट हैं। इसके चलते वह दूध-दही पीने की जगह उनका इस्तेमाल घरेलू नुस्खों में करती हैं, ताकि उनकी स्किन और बाल हेल्दी बने रहें।

दूध और दूसरे डेयरी प्रोडक्ट्स में नेचुरल रूप से पाई जाती है। आपने भी पीते समय उसमें हल्की सी मिठास तो महसूस की होगी। यह मिठास इसी लैक्टोज की वजह से आती है। मां के दूध में लैक्टोज की मात्रा ज्यादा होती है, वहीं गाय, भैंस और बकरी जैसे पशुओं के में थोड़ी कम होती है। उससे बनी कोई दूसरी चीज खाते हैं,

शरीर उसमें मौजूद लैक्टोज पचा नहीं पाता। ऐसी चीजों को खाने के बाद लोगों को पेट में तेज दर्द, ब्लोटिंग, गैस, डायरिया जैसी परेशानियां होती हैं। इसे ही डॉक्टरी भाषा में लैक्टोज इनटॉलरेंस कहते हैं। हर व्यक्ति पर इसका असर अलग-अलग होता है। किसी को हल्की-फुल्की दिक्कतें होती हैं, तो किसी को दूध पीते ही डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है।

एक बड़ी आबादी लैक्टोज इनटॉलरेंस की समस्या का सामना कर रही है

दूध पीने और इसे पचाने में लग गए 10 हजार साल ऐसा जीन खुद को हजारों साल से बदल रहा

किसी का शरीर लैक्टोज पचा पाता है 8 हजार साल पहले घुमंतू जिंदगी जीने वाला इंसान दूध नहीं पचा पाता था। यूरोप और रूस के 94 प्राचीन कंकालों से पता चलता है कि 4300 साल पहले इंसान में LCT जीन विकसित होना शुरू हुआ।
इंसानों में मौजूद इसी क्षमता को वैज्ञानिक ‘लैक्टेज परसिस्टेंस’ (यानी ताउम्र दूध पचाने की क्षमता) या LP कहते हैं।

इस समय दुनियाभर के 35 फीसदी वयस्कों में LP ट्रेट मौजूद है, यानी बढ़ती उम्र में भी उनका शरीर दूध और उससे बनी चीजें पचाने की क्षमता रखता है, लेकिन दही पचाने की क्षमता इंसानों को यूं ही नहीं मिल गई है। इसकी भी एक कहानी है, जिसकी कड़ी जुड़ती है इंसानों के विकास से पशुओं का दूध पीने की शुरुआत करीब 10 हजार साल पहले की।

दूध पचाने की क्षमता विकसित करने की कोशिश में लगा है। इसके बावजूद आज भी दुनिया की एक बड़ी आबादी लैक्टोज इनटॉलरेंस की समस्या का सामना कर रही है।पचाने की क्षमता से जुड़ी गुत्थी पूरी तरह सुलझा नहीं सके हैं। मसलन, अफ्रीकी देश यूथोपिया के सोमाली लोगों में पचाने की क्षमता बहुत कम है। फिर भी वह रोज आधा लीटर दूध गटागट पी सकते हैं।

मिल्क व डेयरी प्रोडक्ट्स ले रही है तो उसे पेट की बीमारी, कुपोषण हो सकता है

दूध पीने और इसे पचाने में लग गए 10 हजार साल ऐसा जीन खुद को हजारों साल से बदल रहा

इसके बाद न तो उन्हें पेट दर्द होता है, न डायरिया या फिर लैक्टोज इनटॉलरेंस से जुड़ी कोई दूसरी दिक्कत। अब यहां से आंतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया का असली खेल शुरू होता है, जो दूध और उससे बनने वाले प्रोडक्ट को पचाने में मदद करता है। प्रेग्नेंट महिला को लैक्टोज इनटॉलरेंस की परेशानी है और वो मिल्क व डेयरी प्रोडक्ट्स ले रही है तो उसे पेट की बीमारी, कुपोषण हो सकता है। समय रहते इसका पता न चला और डॉक्टरी सलाह न मिली तो इस दौरान उसकी जान जा सकती है या फिर उसका मिसकैरिज भी हो सकता है।    Delhi Police Driver Online Form 2022 Notification Apply Online for 1411 Driver Vacancies @ssc.nic.in

कई बार प्रेग्नेंसी के दौरान दूध ज्यादा पीने या डेयरी प्रोडक्ट लेने की वजह से शरीर लैक्टोज पचा नहीं पाता। पचा नहीं पाता है और फिर भी दूध पिए जा रहे हैं या डेयरी प्रोडक्ट्स ले रहे हैं तो पाचन के दौरान जहरीली चीजें भी खून में चली जाती हैं, जिन्हें आंतें रोक नहीं पाती हैं। इसे लीकी गट कहते हैं। इस दौरान प्रोटीन, वायरस, फैट्स भी ब्लड में जाने लगते हैं,

जो बॉडी की अच्छी कोशिकाओं को मारने लगते हैं।हेल्थ एक्सपर्ट पायल कोठारी का कहना है कि कई बार गट हेल्थ यानी आंत से जुड़ी परेशानी की वजह से लैक्टोज इनटॉलरेंस हो जाती है। इस कारण गट में लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया कम हो जाते हैं, जिससे लैक्टोज पच नहीं पाता। आजकल में कई तरह के एंटीबायोटिक्स और केमिकल्स मिले रहते हैं, जिस वजह से भी पेट खराब होता है।