
रूस-चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के बीच ट्रंप ने खेल कर बनाया संतुलन

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पत्नी सहित बंधक बना लेना अब केवल वैचारिक टकराव या मानवाधिकारों के विमर्श तक सीमित नहीं माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा और सामरिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह ट्रंप का एक स्पष्ट ऊर्जा-भू-राजनीतिक दांव है, जिसका उद्देश्य रूस और चीन जैसी ताकतों के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना और दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों पर अमेरिकी कंपनियों की निर्णायक वापसी सुनिश्चित करना है। अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल भंडारों पर प्रभाव स्थापित करने के बाद यह संकेत भी दिया है कि आगे चलकर वही यह तय करेगा कि वेनेजुएला का तेल किन देशों को और किन शतों पर बेचा जाएगा। मादुरो सरकार पर कार्रवाई के बाद अमेरिका को न केवल वैश्विक ऊर्जा बाजार में संभावित नियंत्रण की स्थिति मिली है, बल्कि इससे उसे लैटिन अमेरिका में भी रणनीतिक बढ़त हासिल हुई है, जहां बीते एक दशक में वाशिंगटन का प्रभाव लगातार कमजोर हुआ था।
चीन और रूस को संतुलित करने का दांव

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों के अनुसार वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा लगभग 303 अरब बैरल का सिद्ध तेल भंडार है। Venezuela के तेल बाजार में वापसी के लिए अमेरिका छटपटा रहा था। अब तक वहां रूस और चीन का दबदबा था। अंतरराष्ट्रीय तेल विशेषज्ञों का कहना है कि Venezuela के तेल क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों की गहरी मौजूदगी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक बनी रही। एक्सॉनमोबिल, शेवरॉन जैसी कंपनियां वहां के तेल उत्पादन और रिफाइनिंग में अहम भूमिका निभाती थीं। लेकिन यूह्यूगो चावेज के दौर में शुरू हुए राष्ट्रीयकरण और बाद में निकोलस मादुरो के कार्यकाल में सख्त की गई नीतियों ने इस समीकरण को बदल दिया। ऊर्जा विश्लेषक और काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के वरिष्ठ फेलो रिचर्ड नेफ्यू के अनुसार अमेरिका एक समय वेनेजुएला के तेल से अलग हो गया था, लेकिन जैसे-जैसे चीन और रूस ने वहां निवेश बढ़ाया, वाशिंगटन को यह एहसास हुआ कि उसने रणनीतिक रूप से एक बेहद अहम ऊर्जा क्षेत्र खो दिया है। यही बेचैनी बाद के वर्षों में अमेरिकी नीति में साफ दिखाई देने लगी। बीते वर्षों में चीन और रूस ने वेनेजुएला को ऋण, निवेश और तकनीकी सहयोग देकर वहां गहरी पैठ बनाई। बुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के लैटिन अमेरिका विशेषज्ञ माइकल शिफ्टर के शब्दों में, वेनेजुएला का तेल केवल ऊर्जा का सवाल नहीं है, यह शक्ति-संतुलन का मुद्दा है। जो देश इन भंडारों पर प्रभाव रखेगा, उसे पूरे पश्चिमी गोलार्ध में रणनीतिक बढ़त मिलेगी।



