मच्छरों की फौज इंसानी गंध 100 फीट दूर से सूंघ लेते हैं

विश्वयुद्ध के जमाने में मच्छरों का जैविक हथियार

मच्छरों की फौज इंसानी गंध 100 फीट दूर से सूंघ लेते हैं

मच्छरों की ऐसी ही एक कहानी सिकंदर की मौत के करीब 2200 साल बाद हुए दूसरे विश्वयुद्ध के जमाने में जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर से जुड़ी है। हिटलर ने दुनिया के सबसे ताकतवर देशों की सेनाओं को पस्त करने के लिए मच्छरों से हमला करवाने की स्ट्रेटेजी बनाई थी। इतिहासकारों का दावा है कि हिटलर ने अपने वैज्ञानिकों के साथ मच्छरों को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बनाई थी।

यूरोप और एशिया तक उसने अपनी विजय पताका फहराई, मगर भारत आते-आते उसके पसीने छूट गए। एक तो यहां कि आबोहवा उसे और उसके सैनिकों को रास नहीं आई, दूसरे यहां के शासकों का कड़ा विरोध वे नहीं झेल पाए। झेलम आते-आते सिकंदर और उसके सैनिकों को मच्छरों ने इतना काटा कि उसे जान बचाकर वापस भागना पड़ा। कहते हैं कि खुद सिकंदर को मलेरिया हो गया था और वो इससे उबर नहीं सका। बेबीलोन पहुंचते ही उसने दम तोड़ दिया।                                    दिल्ली में रेवड़ी और बेवड़ी सरकार अनुराग ठाकुर ने कहा

पार्क और घरों में भिन-भिन करते मच्छरों का आस्तित्व लाखों साल से है। तब से जब से डायनासोर थे। इनकी संख्या करीब 110 खरब है। दुनिया में मच्छरों की 2000 से ज्यादा प्रजातियां हैं, जबकि मानव की पिछले 2 लाख साल में 9 प्रजातियां रहीं, जिसमें से अब केवल 1 ही प्रजाति ‘होमो सैपियंस’ बची है।10 हजार 800 करोड़ लोग पृथ्वी पर रहे और 5 हजार करोड़ लोगों की जान मच्छरों ने ली।

यह दावा इतिहासकार टिमोथी सी. वाइनगार्ड की किताब ‘द मॉस्किटो: ह्यूमन हिस्ट्री ऑफ अवर डेडलिएस्ट प्रीडेटर’ (The Mosquito: A Human History of Our Deadliest Predator) में किया गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मच्छर इंसानों पर कैसे भारी रहे।मच्छर कानों के पास ही क्यों भिनभिनाते हैं।

मलेरिया के पैरासाइट की खोज

मच्छरों की फौज इंसानी गंध 100 फीट दूर से सूंघ लेते हैं

मच्छरों की आवाज लगती है, लेकिन यह उनके पंख की आवाज होती है। मच्छर अपने पंख बहुत तेज फड़फड़ाते हैं। कुछ शोधों के अनुसार मच्छर कान के पास इसलिए फड़फड़ाते हैं, क्योंकि कान में कुछ बैक्टीरिया होते हैं और मच्छर कान की गंध से आकर्षित भी होते हैं। मच्छरों की आंखों को इंसान की स्किन लाल-नारंगी रंग के संकेत भेजती है।

मच्छर उनके पास ज्यादा आते हैं। वहीं, मच्छर सुबह के मुकाबले शाम को ज्यादा काटते हैं, क्योंकि उस समय वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड बढ़ जाती है और इसे सूंघकर ही मच्छर अपना शिकार तलाशते हैं।मच्छरों से होने वाले मलेरिया को ढूंढने की कहानी शुरू होती है फ्रांस से। यहां की आर्मी के डॉक्टर अल्फोंस लावेरान ने 1880 में मलेरिया के पैरासाइट की खोज की। 1878 में उनकी पोस्टिंग उत्तरी अफ्रीकी देश अल्जीरिया में हुई।

कई सैनिक रहस्यमयी बीमारी से जूझ रहे थे। उन्होंने इसकी जांच की, तब मलेरिया सामने आया। पहले इसके पीछे थ्योरी दी गई कि मलेरिया गंदी हवा के कारण फैलता है, लेकिन बाद में फ्रांस के वैज्ञानिक लुई पास्चर को पता चला कि यह बीमारी पैरासाइट्स (परजीवियों) की वजह से होती है।मलेरिया प्लाज्मोडियम नाम के पैरासाइट से होने वाली बीमारी है।

यह मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से होता है जो गंदे पानी में पनपता है। गुरुग्राम के पारस हॉस्पिटल में इंटरनल मेडिसिन के डॉ. संजय गुप्ता वुमन भास्कर को बताते हैं कि भारत में मच्छरों के काटने से मलेरिया, डेंगू या चिकनगुनिया के ज्यादा मामले सामने आते हैं।

मच्छर कितनी दूरी से अपने शिकार को सूंघ लेते हैं

मच्छरों की फौज इंसानी गंध 100 फीट दूर से सूंघ लेते हैं

मलेरिया और डेंगू जानलेवा हो सकता है, लेकिन चिकनगुनिया जल्दी ठीक हो जाता है।मरीज को बुखार हो या न भी हो, तब भी मलेरिया 2 तरह के टेस्ट से सामने आ सकता है। इसके लिए स्लाइड और एंटीजन से इसे डिटेक्ट किया जाता है। स्लाइड में थिक और थिन स्लाइड को माइक्रोस्कोप पर देखते हैं। एंटीजन रैपिड टेस्ट होता है। इसकी टेस्ट रिपोर्ट 1 घंटे में आ जाती है।

मच्छर कितनी दूरी से अपने शिकार को सूंघ लेते हैं या सुन सकते हैं। जिसमें यह तथ्य निकलकर सामने आया कि 10 से 50 मीटर की दूरी से मच्छर इंसानो से निकलने वाली कार्बन डाई आक्साइड को सूंघ सकते हैं। जबकि मख्यियां 5 से 15 मीटर की दूरी से ही अपने शिकार को देख पाती हैं।          ALIMCO Recruitment 2022 | Apply for 76 Executive & Non Executive Vacancies!    

मच्छर इंसानों से निकलने वाली गर्मी को काफी आसानी से पहचान लेते हैं जिसकी वजह से इंसानों को सबसे ज्यादा मच्छर काटते हैं। इसके लिए वह अपनी देखने की विशेष क्षमता का भी प्रयोग करते हैं।इस बात का पता लगाने के लिए कि कैसे मच्छर अपनी इंद्रियों का प्रयोग करते हैं कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने कुछ भूके मच्छरों को हवाभरी सुरंग में डाला जिसमें कई तरह की गंध थी।