
मुफ्त बिजली नहीं, काम दें’ रेवड़ी स्कीमों पर SC सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्य सरकारों की ओर से चुनाव से ठीक पहले ‘फ्रीबीज’ यानी मुफ्त सुविधाओं के वादों पर कड़ी टिप्पणियां की। कोर्ट ने सवाल उठाया कि चुनाव के पास आते ही योजनाएं अचानक क्यों घोषित होती है और यह प्रवृत्ति आखिर कब तक जारी रहेगी? इससे देश के आर्थिक विकास पर उलट प्रभाव पड़ सकता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि यह पूरे देश में हो रहा है। चाहे राज्य घाटे में हों या रेवेन्यू सरप्लस हो। अगर किसी राज्य के पास पैसा (रेवेन्यू सरप्लस) है तो भी क्या यह उसकी जिम्मेदारी नहीं है कि उस पैसे का इस्तेमाल सड़क, स्कूल और अस्पताल बनवाने में खर्च हो। यह समय है कि सभी राजनीतिक दल और नेता इन नीतियों पर फिर से विचार करें। अगर हम इस तरह अनुदान बांटते रहेंगे तो राष्ट्र के विकास में बाधा पैदा होगी। संतुलन होना चाहिए। राज्यों को रोजगार के रास्ते खोलने के लिए काम करना चाहिए।>>>Visit: Samadhanvan
सुप्रीम कोर्ट का सवाल, यह कैसा कल्चर, क्या यह तुष्टीकरण नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाते हुए ये बातें कहीं, जिसने बिजली कानून के हवाले से बिल पर सब्सिडी दी है। इसे तमिलनाडु पावर डिस्ट्रिब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्यों द्वारा बिजली बिल का भार वहन करने पर सवाल उठाया और कहा कि क्या यह जनहित में है कि राज्य यह सब भार वहन करे ? फ्रीबीज के कारण पूरा देश प्रभावित हो रहा है। हम सिर्फ तमिलनाडु की बात नहीं कर रहे हैं। हम पूरे भारत की बात कर रहे हैं। राज्यों को रोजगार के रास्ते खोलने के लिए काम करना चाहिए। आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन, मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली देंगे, तो काम कौन करेगा। भुगतान तुष्टिकरण की नीति नहीं है? कौन करने में सक्षम राज्य है, और कौन नहीं, इसमे अंतर ही नहीं है, यह पूरे देश में हो रहा है और हम कभी-कभी वास्तव मे चितित हो जाते है। किसी उसका दायित्व यह नहीं है कि वह उस पैसे से विकास के काम करे



