
सुप्रीम कोर्ट हल्द्वानी में रेलवे की भूमि पर कब्जा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे की भूमि पर अतिक्रमण करने वालों का वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इससे संकेत मिलता है कि प्रस्तावित विस्तार परियोजना के लिए 5,000 से अधिक परिवारों को विवादित भूमि खाली करनी होगी सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि भूमि विवाद विभिन्न अदालतों में जा चुका है और अतिक्रमित रेलवे भूमि पर गतिरोध को अनिश्चित काल तक जारी नहीं रहने दिया जा सकता। पीठ ने केंद्र और राज्य प्रशासन को निर्देश दिया कि वे क्षेत्र में रहने वाले परिवारों की प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के लिए पात्रता सुनिश्चित करें।करने सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल कलेक्टर, हल्द्वानी उपमंडल अधिकारी और जिला स्तरीय विधि सेवा प्राधिकरण के सदस्यों समेत अन्य अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे क्षेत्र का दौरा करें और एक शिविर स्थापित करें ताकि जमीन पर कब्जा वाले परिवारों को योजना का लाभ उठाने के लिए आवश्यक प्रपत्र और औपचारिकताएं पूरी करने में सहायता मिल सके। पीठ ने कहा कि यदि पात्र परिवार पीएमएवाई योजना के लिए 31 मार्च तक आवेदन देते हैं तो न्यायालय सराहना करेगा। पीठ ने कलेक्टर और राज्य विधि सेवा प्राधिकरण के सचिव को स्थिति रिपोर्ट देने का निर्देश दिया।>>>Visit: Samadhanvan
रेलवे को परियोजना स्थानांतरित करने के लिए नहीं कह सकती

हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास के क्षेत्र में चार-पाच दशकों से रह रहे हैं। इस पर जस्टिस बागची ने कहा, यह सार्वजनिक भूमि है, या यूं कहें कि रेलवे की भूमि है, इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है। वास्तव में, आपको वहां रहने के लिए रियायत मिल रही है। आपको रियायत इसलिए मिल रही है क्योंकि अधिकारी वर्षों तक गैरकानूनी गतिविधियों को नजरअंदाज करते रहे। भूषण ने कहा कि विस्तार परियोजना के लिए सारी जमीन की आवश्यकता नहीं है और रेलवे सिर्फ उतनी ही जमीन ले सकता है जितनी आवश्यक हो या परियोजना को स्थानांतरित कर सकता है। इस पर सीजेआई ने कहा, क्योंकि यह विशेषज्ञों का काम है याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कॉलिन गॉसाल्वेस ने कहा कि इस क्षेत्र में कई धार्मिक स्थल हैं और लोगों को विस्थापित करने से पहले पुनर्वास की जरूरत है। सीजेआई ने गोंसाल्वेस से कहा, इन लोगों पर दया कीजिए। ये लोग अस्वच्छ परिस्थितियों में रह रहे हैं, जहां पीने योग्य पानी, बिजली और सीवेज की व्यवस्था नहीं है। उन्हें यह तय करने दीजिए कि वे पीएमएवाई योजना के तहत घर चाहते हैं या नहीं, और यदि कोई बाधा आती है, तो अदालत उसका समाधान करेगी।



