
152 सीटों पर वोटिंग ममता के किले को भेदना भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती

Bengal की सत्ता की निर्णायक बाजी पहले चरण की 152 सीटों पर खेली जानी है। बड़ा सवाल है, ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल सत्ता का चौका लगाएगी या भाजपा अपने विस्तार की कहानी को ऐतिहासिक मुकाम तक पहुंचाएगी। इसी चरण में तय होगा कि Bengal का परिवर्तन केवल नारा है या जमीनी हकीकत। पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2021 के आंकड़ों में तृणमूल ने पहले चरण के चुनाव वाली 92 सीटें जीतकर वर्चस्व सिद्ध किया था। वहीं, भाजपा ने भी अपनी कुल 77 में से 59 सीटें यहीं से जीत ताकत का अहसास कराया था। अब सवाल उस फोटो फिनिश मुकाबले का है, जिसकी आहट हवाओं में साफ महसूस की जा रही है। 2021 और 2026 की जंग में भाजपा की रणनीति का अंतर बिल्कुल साफ है। ममता ने अपने जुझारू अंदाज से भाजपा को यह तो समझा दिया कि Bengal का हिंदू मानस उत्तर भारत से अलग है महापर्व का जोश पहले चरण में 16 जिलों में बृहस्पतिवार को होने वाली वोटिंग को लेकर Bengal में जबरदस्त उत्साह है। तस्वीर हावड़ा की है, जहां अपने-अपने क्षेत्रों में पहुंचने के लिए यात्रियों की भारी भीड़ रही। जंगलमहल व उत्तर बंगाल क्या बदलेगा भूगोल ?>>>Visit: Samadhanvan
रणनीति का नया व्याकरण अस्त्र वही, अंदाज नया

भाजपा ने 18 फीसदी वाले महतो समुदाय की पहचान को संविधान के पन्नों से जोड़कर ऐसी भावनात्मक लहर पैदा की है, जिसने तृणमूल की सांगठनिक दीवार में दरारें डाल दी हैं। विशेषकर जंगलमहल (पुरुलिया, बांकुड़ा, झारग्राम) में महतो समुदाय का रुख निर्णायक होगा। भाजपा ने उनकी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करने का वादा कर तृणमूल के गढ़ में बड़ी सेंध लगाई है। यह वोट बैंक छिटका, तो तृणमूल के लिए 92 का आंकड़ा बचाना मुश्किल होगा। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि हमेशा तृणमूल के साथ रहने वाला महतो समुदाय में भाजपा के भाषाई कार्ड ने वैचारिक दरार पैदा की है। इस चरण में पलायन, गवर्नेस और पहचान की राजनीति सबसे बड़े कारक हैं। उत्तर बंगाल, कूचबिहार और मिदनापुर जैसे क्षेत्रों में इस बार तीन मुख्य मुद्दे हावी हैं-प्रवासी मजदूरों का पलायन, कानून-व्यवस्था और बेरोजगारी।



