PFI पर 15 साल में 20 राज्यों में फैला जेहाद को बढ़ावा देने के आरोपों के छींटे

PFI  झारखंड के बैन को भी अदालत में चुनौती

PFI पर 15 साल में 20 राज्यों

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PFI को एक ‘चरमपंथी संगठन’ बताया था। हिंदूवादी संगठन PFI को प्रतिबंधित करने की मांग करते रहे हैं और मीडिया में केंद्र सरकार से इस संगठन को प्रतिबंधित करने पर विचार करने की रिपोर्टें भी आती रही हैं।झारखंड के बैन को भी अदालत में चुनौती दी गई है।वहीं PFI खुद को एक सामाजिक संगठन बताता है और कहता है कि वो दबे-कुचले वर्ग के उत्थान के लिए काम करता है।

केरल में प्रोफेसर टीजे जोसेफ का हाथ काटने की घटना के बाद। प्रोफेसर जोसेफ पर एक प्रश्नपत्र में पूछे गए सवाल के जरिए पैगंबर मोहम्मद साहब के अपमान का आरोप लगा था। इसके बाद आरोप है PFI कार्यकर्ताओं ने प्रोफेसर जोसेफ के हाथ काट दिए थे।इस्लाम की कट्टरपंथी विचारधारा को फैलाता है और लागू करता है। उनकी सभी गतिविधियां, जिनमें 2010 में मुझ पर हुआ हमला भी शामिल है, ने समूचे भारत में आतंक की एक लहर पैदा की है। ये संगठन लोगों के शांतिपूर्वक जीवन और देश की धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरा बन गया है।”

CFI के कार्यकर्ताओं ने वामपंथी छात्र संगठन SFI (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया) के छात्र नेता अभिमन्यु की चाकू मार कर हत्या कर दी थी। तब भी PFI सवालों में घिरा था।PFI बिहार में साल 2016 से सक्रिय है। पूर्णिया जिले में संगठन ने हेडक्वार्टर स्थापित करने की तैयारियां की थीं। इसके अलावा राज्य के 15 से अधिक जिले में ट्रेनिंग सेंटर भी चलाए हैं।

NDF और ये संगठन एक होकर PFI बन गए

PFI पर 15 साल में 20 राज्यों

 

पटना में गिरफ्तारियों के बाद अब जांच NIA कर रही है। NIA ने PFI का नेटवर्क तलाशने के लिए बिहार के कई शहरों में छापेमारी भी की है।PFI अनपढ़, बेरोजगार मुस्लिम युवाओं को टारगेट करके अपने साथ जोड़ रहा है। पुलिस जांच में सामने आया है कि युवाओं को हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी गई है।

तार विदेशों से जुड़े होने और बाहर से फंडिंग की भी जांच की जा रही है। पुलिस को PFI के अकाउंट में 90 लाख रुपए मिले हैं। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए खड़े हुए आंदोलनों से जुड़ती हैं। 1994 में केरल में मुसलमानों ने नेशनल डेवलपमेंट फंड (NDF) की स्थापना की थी।NDF ने केरल में अपनी जड़ें मजबूत कीं और इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई और इस संगठन की सांप्रदायिक गतिविधियों में संलिप्तता भी सामने आती गई।

साल 2003 में कोझिकोड के मराड बीच पर 8 हिंदुओं की हत्या में NDF के कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए। इस घटना के बाद BJP ने NDF के ISI से संबंध होने के आरोप लगाए, जिन्हें साबित नहीं किया जा सका।
भारतीय राज्यों, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी मुसलमानों के लिए काम कर रहे संगठन सक्रिय थे। कर्नाटक में कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी यानी KFD और तमिलनाडु में मनिथा नीति पसाराई (MNP) नाम के संगठन जमीनी स्तर पर मुसलमानों के लिए काम कर रहे थे।

इन संगठनों का भी हिंसक गतिविधियों में नाम आता रहा था। नवंबर 2006 में दिल्ली में हुई एक बैठक के बाद NDF और ये संगठन एक होकर PFI बन गए। इस तरह साल 2007 में PFI अस्तित्व में आया और आज 20 राज्यों में ये संगठन काम कर रहा है।

PFI के अलग-अलग जिले में साजिश के तहत इस FIR

PFI पर 15 साल में 20 राज्यों

राज्यों के अन्य संगठन के साथ जुड़ते चले गए। गोवा का सिटीजन फोरम, पश्चिम बंगाल का नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति, आंध्र प्रदेश का एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस और राजस्थान का कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशन सोसायटी- ये सभी संगठन PFI का हिस्सा हो गए।देश के अधिकतर हिस्सों में सक्रिय है, लेकिन इसका मजबूत आधार दक्षिण भारत में ही है। हाल ही में जब कर्नाटक में हिजाब विवाद हुआ तो कैंपस फ्रंट ऑफ इंडियाअपनी जड़ें मजबूत करने के लिए उसका जमकर इस्तेमाल किया।

पुलिस ने फेब्रिकेट किए और वहां रखे हैं। इन दस्तावेज को 2047 तक भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने का मास्टर प्लान बताया गया है। UP के बस्ती में एक केस हुआ था, उसकी चार्जशीट में भी यही दस्तावेज शामिल किया गया था। हमारा सवाल है कि जो दस्तावेज यूपी पुलिस की चार्जशीट में था, वो बिहार पुलिस के पास कहां से आया? इससे एक बात साफ होती है कि पूरे भारत के खिलाफ एक बहुत बड़ा अभियान चल रहा है।

जो FIR पटना में की गई, उसमें पहले PFI का नाम नहीं था। बाद में कई और लोगों के नाम इसमें जोड़े गए। इनमें से कई लोग के सदस्य और नेता हैं। ये वहां के हैं ही नहीं, बल्कि अलग-अलग इलाकों के हैं। इन्हें फंसाया गया है। PFI के अलग-अलग जिले में काम करने वाले लोगों का नाम एक साजिश के तहत इस FIR में जोड़ा गया है।

प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान आर्म्स ट्रेनिंग दे रही थी, लेकिन किसी ने पुलिस से नहीं पूछा कि इस दौरान पुलिस क्या कर रही थी। मीडिया पुलिस के इकतरफा बयानों पर भरोसा कर PFI पर सवाल खड़े करता है और हमें अपनी बात रखने का मौका भी नहीं देता।

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