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पाकिस्तान में हरा पासपोर्ट देख कोई काम नहीं देता रात-बिरात बेटियां उठा ली जातीं हैं

हिंदू शरणार्थी गुजरात-राजस्थान के अलावा दिल्ली में भी बसे हुए हैं

हमारे पास हरे रंग का पासपोर्ट है। देखते ही सब भड़क जाते हैं। कई बार भीड़ ने हमें बांधकर पुलिस बुला ली कि उन्होंने भेष बदलकर आए खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादियों को पकड़ लिया है। जैसे-तैसे जान बची।पाकिस्तान से धार्मिक वीजा पर भारत आए हिंदू शरणार्थी गुजरात-राजस्थान के अलावा दिल्ली में भी बसे हुए हैं। ‘बसे हुए’ यानी- जहां मलबा फेंका जाता है, उस जमीन के एक कोने को झाड़-बुहारकर कच्ची झोपड़ियां बना डालीं। आंगन में तुलसी चौरा लगायाऔर छतों पर तिरंगा।

हिंदू शरणार्थी गुजरात-राजस्थान के अलावा दिल्ली में भी बसे हुए हैं
हिंदू शरणार्थी गुजरात-राजस्थान के अलावा दिल्ली में भी बसे हुए हैं

नाम- अमरता! गहरी काली आंखों और गुलमुल्ले गालों वाली ये बच्ची इसी मिट्टी की पैदाइश है

बसाहट के नाम पर इतना ही इंतजाम।बारिश में नाले के पानी के साथ इनके आंगन में सांप-बिच्छू भी डोलने लगते हैं। बिजली न होने से गर्मियों में लू से मौतें होती हैं। अस्पताल में भर्तियां नहीं होतीं और न ही कोई काम देता है- क्योंकि आखिर नमक तो इन्होंने पाकिस्तान का खाया!बस्ती के भीतर जाने के लिए कोई सड़क नहीं, पूरा मलबा ही रास्ता है। कूड़े के ढेर पर पांव रखते हुए आगे पहुंची तो हमारी मुलाकात एक बच्ची से हुई। नाम- अमरता! गहरी काली आंखों और गुलमुल्ले गालों वाली ये बच्ची इसी मिट्टी की पैदाइश है, लेकिन उसके पास कागज नहीं।

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पाकिस्तान का भूत अब भी पीछा नहीं छोड़ रहा

उसे मिट्टी में ही खेलता हुआ छोड़कर हम आगे बढ़ते हैं, जहां 28 साल के तीरथ हमारा इंतजार कर रहे हैं।नौजवान अपने चार बच्चों का हवाला देते हुए कहता है- इन्हीं के चलते भागना पड़ा। पाकिस्तान में बच्चियों का कोई रखवाला नहीं। कोई भी उठा ले जाएगा और उसके बाद खबर तक नहीं मिलेगी। बच्ची के नाम से लेकर पहचान सब कुछ बदल दिया जाएगा। विरोध करो तो बाकियों का भी वही हाल होगा।पाकिस्तान का भूत अब भी पीछा नहीं छोड़ रहा। चेहरे पर हाथ फेरते हुए कहते हैं- हम तो भाग आए, लेकिन बाकी परिवार वहीं रह गया।

पाकिस्तान में माइनॉरिटी की हालत आवारा जानवरों से भी बेकार है

पाकिस्तान में माइनॉरिटी की हालत आवारा जानवरों से भी बेकार है

रात पिताजी से बात हुई। बारिश में मकान ढह रहा है। वे परेशान थे कि कौन-कौन सी मुसीबत संभालें। वहां माइनॉरिटी की हालत आवारा जानवरों से भी बेकार है। खेती हम करते हैं, पैसे वे कमाते हैं। रात-बिरात घर पर हमले हो जाते हैं। कभी पैसे लूटे जाते हैं, कभी औरतें। पाकिस्तान के सिंध की पहचान। बिल्लियों और चींटियों से बचाने के लिए इस पर रोटियां रखी जाती हैं। ऊंचाई इतनी कि घर का सबसे बड़ा बच्चा उचककर रोटी निकाल सके और बाकी बच्चों को खिला सके।

जेल से छूटे लोग आजादी का असल मतलब जानते हैं

छूकर देखती हूं तो कहती हैं- उधर से दो ही चीजें लेकर आए, ये कटोरदान और वहां की चादरें। बाकी सब कुछ छूट गया। परिवार भी6 साल पहले धार्मिक वीजा पर भारत पहुंचे रामजी लगातार वीजा बढ़ा रहे हैं, क्योंकि वापस नहीं लौटना चाहते। वे याद करते हैं- जब बॉर्डर पार कर रहे थे, आखिरी कदम था, जो पाकिस्तान में था। उसके बाद का कदम हमें इंडिया पहुंचा रहा था। वो एक कदम हमेशा याद रहेगा। जेल से छूटे लोग आजादी का असल मतलब जानते हैं। हम भी एक किस्म की जेल से निकलकर आए।

अच्छे-खासे परिवारवाले अनाथों की तरह अकेले शमशान पहुंच रहे थे

सवाल दोहराने पर जवाब आता है- हां, कोरोना के समय बहुत डर लगा था। पॉलिथीन में बंद लाशें आतीं। अच्छे-खासे परिवारवाले अनाथों की तरह अकेले शमशानपहुंच रहे थे। बच्चे अपने मरे हुए मां-बाप से भाग रहे थे। इतनी लाशें जलीं कि कोई हिसाब नहीं। हर बार लगता कि अगली बारी हमारी होगी, लेकिन कुछ इंसानियत और कुछ आदत ने सब करवा दिया।

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