
क्रिसिल कच्चा माल महंगा होने से सरकारी खजाने पर बढ़ेगा बोझ

Subsidy bill में एशिया संघर्ष अगर जारी रहता है, तो भारत में उर्वरक के घरेलू उत्पादन में 10-15 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। साथ ही, कच्चे माल की कीमतों में उछाल से उर्वरक सब्सिडी के’ मोर्चे पर सरकार का खर्च करीब 20,000-25,000 करोड़ बढ़ जाएगा। क्रिसिल रेटिंग्स ने एक रिपोर्ट में कहा, सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान उर्वरक सब्सिडी पर खर्च 1.71 अनुमान वाजता करोड़ रुपये रहने का बिल में 20,000-25,000 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी होती है, Subsidy bill में तो इस पर सरकार का कुल खर्च करीब 12-15 फीसदी तक बढ़ सकता है। मुताबिक, घरेलू उर्वरक क्षेत्र आयात पर अत्यधिक निर्भर है। यह क्षेत्र यूरिया के कुलं मांग का 20 फीसदी आयात करता है, जिसकी कुल घरेलू खपत में करीब 45 फीसदी हिस्सेदारी है। साथ ही, एक तिहाई कॉम्प्लेक्स उर्वरकों और डीएपी (प्राइमरली) का भी आयात करता है। Subsidy bill में कॉम्प्लेक्स उर्वरकों ,डाई अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी,नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और सिंगल सुपर फॉस्फेट शामिल हैं। क्रिसिल रेटिंग्स के एसोसिएट निदेशक नितिन बंसल ने कहा, यूरिया और डीएपी दोनों के लिए आयात के लिए पश्चिम एशिया एक अहम क्षेत्र बना>>>Visit: Samadhanvan
1.7 लाख करोड रुपये खर्च हो सकता है उर्वरक सब्सिडी पर 2026-27 में

Subsidy bill में भारत घरेलू उर्वरक उत्पादन के लिए 60-65 फीसदी लिक्विड प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और 75-80 फीसदी अमोनिया का आयात पश्चिम एशिया क्षेत्र से करता है। मौजूदा संघर्ष से हालात नाजुक बने हुए हैं और आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ रही है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले. नी महीनों में कुल आयात का लगभग 40-फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र से आया है। Subsidy bill में भारत के पास सीमित भंडार रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू भंडार सीमित होने के कारण भारत यूरिया के लिए जरूरी कच्चे माल प्राकृतिक गैस का आयात करता है। इस पर कच्चे माल की कुल लागत का 80 फीसदी खर्च होता है। कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के लिए अमोनिया और फॉस्फोरिक एसिड जैसे कच्चे माल का आयात किया जाता है।



