जनता के मुद्दों पर गंभीर चर्चा करना है। वहीं लोकतंत्र में शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन नागरिकों का
संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जब संसद का बहुमूल्य समय लगातार हंगामे की भेंट चढ़ने लगे और
सड़क पर चल रहे आंदोलनों का स्वर समाधान से अधिक राजनीतिक टकराव का प्रतीक बन जाए, तब
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर सबसे बड़ा नुकसान किसका हो रहा है। इसका सीधा उत्तर
है—देश के छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों का।
नीट पेपर लीक का मामला अत्यंत गंभीर है। करोड़ों परिवारों की उम्मीदें प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी होती
हैं। यदि परीक्षा की गोपनीयता भंग होती है तो केवल प्रश्नपत्र नहीं लीक होता, बल्कि लाखों विद्यार्थियों
का विश्वास भी टूटता है। इसलिए दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई आवश्यक है। केंद्र सरकार ने मामले
की जांच सीबीआई को सौंपी, कई आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और प्रधानमंत्री ने पेपर लीक के मामलों के
लिए फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित करने की घोषणा की। सरकार ने संसद में यह भी कहा कि वह इस
विषय पर किसी भी दिन और किसी भी अवधि की चर्चा के लिए तैयार है।
इसके बावजूद संसद के मानसून सत्र में गतिरोध बना रहा। विपक्ष ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे
को चर्चा की पूर्व शर्त बना दिया। संसद के बाहर इंडिया गठबंधन और एनडीए के सांसद आमने-सामने आ
गए। नारेबाजी हुई, आरोप-प्रत्यारोप हुए और दोनों सदनों की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन यदि संसद ही चर्चा का मंच न बन सके तो फिर जवाबदेही
किस प्रकार तय होगी।
विपक्ष का कहना है कि शिक्षा मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दें। यह उनका राजनीतिक
अधिकार है। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि जांच चल रही है, गिरफ्तारी हो चुकी है और चर्चा के लिए
वह तैयार है। ऐसे में लोकतांत्रिक परंपरा यही अपेक्षा करती है कि पहले संसद में खुली बहस हो, तथ्यों
पर चर्चा हो और उसके बाद राजनीतिक निष्कर्ष निकाले जाएं। यदि हर विषय पर पहले इस्तीफे की शर्त
रखी जाएगी तो संसदीय विमर्श की परंपरा कमजोर होगी।
वर्तमान घटनाक्रम का दूसरा पक्ष जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन है। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन पूरी
तरह वैध है, लेकिन जब किसी आंदोलन के दौरान हिंसा, पुलिस से टकराव, सार्वजनिक संपत्ति को
नुकसान पहुंचाने या आम नागरिकों के जीवन को बाधित करने जैसे आरोप सामने आते हैं, तब आंदोलन
की नैतिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है। यदि किसी प्रदर्शन में कानून का उल्लंघन होता है तो पुलिस का
कर्तव्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। वहीं पुलिस की कार्रवाई भी कानून के दायरे में और निष्पक्ष
होनी चाहिए। दोनों पक्षों की जवाबदेही लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में भी
देख रहा है। छात्र और युवा हर चुनाव में महत्वपूर्ण मतदाता होते हैं। ऐसे में कोई भी राजनीतिक दल
स्वयं को युवाओं का सबसे बड़ा हितैषी दिखाना चाहता है। यही कारण है कि नीट का मुद्दा केवल परीक्षा
व्यवस्था तक सीमित न रहकर राजनीतिक संघर्ष का प्रमुख विषय बन गया है। लेकिन इस पूरी कवायद
में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या छात्रों की वास्तविक समस्याएं केंद्र में हैं या राजनीतिक लाभ?
इतिहास भी बताता है कि परीक्षा अनियमितताओं और पेपर लीक की घटनाएं केवल किसी एक सरकार
या एक राजनीतिक दल के कार्यकाल तक सीमित नहीं रही हैं। पूर्ववर्ती सरकारों के समय भी विभिन्न
राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षाओं में पेपर लीक तथा धांधली के मामले सामने आए थे। इससे स्पष्ट है
कि यह समस्या राजनीतिक दलों से अधिक परीक्षा व्यवस्था की संस्थागत कमजोरियों से जुड़ी है।
इसलिए यदि आज विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है तो यह उसका अधिकार है, लेकिन उसे यह भी
स्वीकार करना होगा कि परीक्षा प्रणाली में सुधार सभी सरकारों की साझा जिम्मेदारी रही है।
संसद में लगातार हंगामे का एक और गंभीर परिणाम है। मानसून सत्र में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक
प्रस्तुत करना चाहती है, जिनमें न्यायपालिका, शिक्षा, एमएसएमई, आयकर और अन्य विषयों से जुड़े
प्रस्ताव शामिल हैं। यदि सदन बार-बार स्थगित होगा तो इन विधेयकों पर सार्थक चर्चा प्रभावित होगी।
लोकतंत्र में सरकार का दायित्व कानून बनाना है और विपक्ष का दायित्व उन कानूनों की समीक्षा करना।
यदि दोनों भूमिकाएं टकराव की राजनीति में बदल जाएं तो नुकसान पूरे देश का होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि छात्र हित को राजनीति से ऊपर रखा जाए। यदि विपक्ष के पास
सरकार से कठिन प्रश्न हैं तो उन्हें संसद में पूरी ताकत से उठाना चाहिए। यदि सरकार दावा करती है कि
वह दोषियों को सजा दिलाएगी तो उसे समयबद्ध जांच, पारदर्शिता और परीक्षा सुधारों के माध्यम से इसे
साबित भी करना होगा। केवल राजनीतिक बयानबाजी से छात्रों का विश्वास वापस नहीं आएगा।
देश के युवाओं को नारे नहीं, निष्पक्ष परीक्षाएं चाहिए। उन्हें सड़क पर संघर्ष नहीं, अपने परिश्रम का
सम्मान चाहिए। संसद का समय हंगामे में व्यतीत करने की बजाय यदि सभी दल शिक्षा व्यवस्था को
अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और आधुनिक बनाने पर सहमति बनाएं तो यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी
सफलता होगी।
भारतीय लोकतंत्र की शक्ति विरोध में नहीं, बल्कि संवाद में है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों लोकतंत्र के
दो मजबूत स्तंभ हैं। यदि दोनों केवल राजनीतिक लाभ के लिए एक-दूसरे का विरोध करते रहेंगे तो
लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी। लेकिन यदि दोनों छात्र हित, शिक्षा सुधार और पारदर्शी परीक्षा
व्यवस्था को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे तो यही देश के भविष्य के प्रति उनकी वास्तविक प्रतिबद्धता होगी।
आज आवश्यकता आरोपों और नारों की नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, संवाद और सुधार की है। देश के करोड़ों
युवा यही अपेक्षा करते हैं कि उनका भविष्य किसी राजनीतिक संघर्ष का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय
प्राथमिकता बने। संसद चले, बहस हो, दोषियों को दंड मिले और ऐसी व्यवस्था बने जिसमें किसी भी
प्रतिभाशाली छात्र को यह भय न रहे कि उसकी मेहनत किसी पेपर लीक या भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़
जाएगी। यही लोकतंत्र की सफलता होगी और यही राष्ट्रहित भी।
